India: Peace and war
भारत: शांति और युद्ध
हर जातिके लोगोको अपने बच्चों के नाम कैसे देने चाहिए जो खाश अर्थसभर भाव पैदा करे, इस के कानून मनुस्मृतिमें दिए गए है। ब्राह्मणके लिए नाम 'शुभ' ; क्षत्रियके लिए नाम 'ताकत'; वैश्य के लिए 'संपत्ति' और शूद्र के लिए 'असन्माननीय (जुगुप्सितम) होने चाहिए। (२:३१) ब्राह्मणके लिए नाम 'सुख' ; क्षत्रियके लिए नाम 'रक्षा'; वैश्य के लिए 'समृद्धि' और ‘शूद्र’ के नाम लिए 'सेवा' के भावसूचक होने चाहिए (२:३२)।
१९७७मे मैंने मेरे कॉलेजके अध्यापक के साथ गुजरातके गाँव में जाना शुरू किया तब वहाँ मुझे यह समज नहीं आया की दलितके नाम 'पोचा' 'पुंजा' 'कचरा' 'मैला' 'गोबर' 'गांडा' 'घेला' क्यों थे ? कभी लोगोसे यह सुनना भी मिलता था की दलित अपने बच्चोके नाम 'आधुनिक' भी रखते थे तो पंजीकरणके दौरान पटवारी नाम तोड़-मरोड़ देता था। दलित-आदिवासी महिलाओ के नाम भी इसी तरह आज पुरे देशमें मिलेंगे।
खैर, गुजरातके मूलनिवासी और उत्तर प्रदेशमें रहनेवाले 'नट-बजानिया', जो घुमंतक प्रजासमुह है उन्होंने अपने नाम मनुस्मृतिकी बातों से हटके रखे थे। औरत का नाम 'पूजा', पतिका नाम 'राहुल' और उनके चार सालके बेटे का नाम 'रोहन'। भारतमे ऐसे नाम वाले फिल्म-सितारे भी है, उद्योगपति भी है और राजनेता भी। लेकिन यह परिवारके साथ हुआ जो किसी और 'पूजा-राहुल-रोहन' के साथ नहीं होगा।
'पूजा-राहुल-रोहन' विश्व-विख्यात आग्रा स्थित ताजमहल से सिर्फ २० किलोमीटर की दुरी पर रेभा नामक गावँ में रहते है जो और तीन गाँवके साथ 'काकरपुरा' गाँव पंचायतका सदस्य है और अछनेर तहसीलमे पड़ता है। गर्भाशय मे चेप लगने से लम्बी बीमारीके बाद १९ जुलाई २०२० के दिन २५ वर्षीय पूजाकी मौत हो गई। इसी गाँव पंचायतमें चार गाँव के बिच ११ स्मशान मौजूद है। नट-बजानिया परिवारोने भी अपने 'स्मशान' की ज़मीन मांगी थी, लेकिन अभी सिर्फ सरकारने ज़मीन देनेका वादा किया था। उत्तर प्रदेशकी अभी तक की सरकारोने शायद यह लिखके नहीं दिया था की हर गाँवमे सरकारी ज़मीन पर और सरकारी पैसे से जो स्मशान बने है उसी पर सभी का इस्तेमाल-अधिकार है। गाँवमे दलितो की श्मशानभूमि है जो अखबारों के अनुसार ब्राह्मणकी पेशकदमीसे दबी हुई है। अच्छी बात है, कम-से-कम ज़मीन भले दलितकी श्मशानभूमि क्यूँ न हो, छुआछूतसे मुक्त है !!
राहुलके पास कोई चारा न था। ऐसे भी 'संविधान बचाओ' जैसे लाखो नारे शायद उसने भी सुने थे और शायद देवी-देवता नहीं बल्कि भारतका संविधान उसकी रक्षा करेगा यह भरोसा था। इसी लिए उसने लकड़ी और गोबर लगा कर अपनी प्यारी पत्नीके अग्निसंस्कार के लिए चित्ता बनाई। पूजा, जिस दिन शादी रचा के, नयी दुल्हन बन ससुराल आयी थी तब जो साडी पहनी थी, इसी साडी मे उसका मृत शरीर लपेटा हुआ था। आज चार सालका रोहन अपनी माँ को 'अग्नि' देनेवाला था। रोहन के हाथ मे आग की मशाल थी और उस को चित्ता के चारो और चलाया जा रहा था तभी हड़कंप मच गया। २०० ठाकुरो का टोला जमा हो गया और अग्निसंस्कार रोक दिया। ठाकुरो की स्मशानभूमि मे दलित का अग्निसंस्कार कैसे हो सकता है, यह टोला का आक्रोश था। पुलिसको बुलाया गया। क्षेत्राधिकारी और थाना प्रभारी दूसरे अधिकारी के साथ पहुंच गए लेकिन संविधानकी धज्जिया उड़ती बचा न पाए। छह घंटोंके संघर्षके बाद राहुल ने आखिर असहाय होकर जिस हाथोसे अपनी पत्नीका मृत शरीर चिता पर रखा था, उसी हाथो से वापिस ज़मीन पर उतारा। चित्ता की सभी कंकु-रंजीत लकड़ी और गोबर भी इकठ्ठा किया गया। वहाँ से चार किलोमीटर दूर नगला लाल दास नामके गाँवमे दलितो की 'आरक्षित' स्मशानभूमि में दूसरी चिता बनी और पूजा का अग्निसंस्कार संपन्न हुआ। अगले बीस सालमें कल ही बनी भारत की नई 'शिक्षा निति' रोहन को इस देश-राष्ट्र-कानून-संविधान-धर्म-मूल्य-नैतिकता-मौलिक अधिकार-न्यायतंत्र-प्रशाशन के बारे मे सही ज्ञान देनेमे असफल रहनेवाली है, वो सभी उसने छह घंटेमें सिख लिया।
पुलिस जाँच नहीं होंगी क्योंकि ऍफ़ आई आर (FIR) दर्ज नहीं हुई। कसूर तो दरअसल राहुल का है की उसने ऍफ़ आई आर दर्ज नहीं करवाई। राहुल का मानना है की 'अपना बचा हुआ परिवार' 'शांति' से रह पाए इसी लिए उसने ऍफ़ आई आर दर्ज नहीं करवाई। नेहरू-दलाई लामा-मधर टेरेसा और ढेर सारी महान व्यक्तिओ का 'शांति-सन्देश' जग-मशहूर हो गए है लेकिन राहुल का 'शांति-सन्देश' भले २,००,००० लोगोने विडिओ देखा उसके बावजूद जग-मशहूर नहीं होगा। न राहुलको शांति-का-नोबेल-पुरष्कार मिलेगा। दलितोको शांति से जीना है तो संविधानको भूल जाना पड़ेगा, यह क्रांतिकारी सन्देश राहुल देना चाहता था क्या ? हकीकत यह है की राहुल जिसको ‘शांति’ मानता है, वो सही अर्थमे 'सलामती' है। गाँवमे किसी नट-बजानिया परिवार के पास खेती का ज़मीन नहीं है और अपने जीवन-निर्वाह के लिए इसी जाति के लोगो पर निर्भर है जो इस दलित परिवारोंको रोटी से विमुख कर शकते है। इस गाँव में दलितोको भारी संघर्ष के बाद सार्वजनिक हैण्डपम्प से पानी मील सकता है।
राहुल को डर लगा यह सत्य है। कानूनके मुताबिक, जो अपराध हुआ उसके बारे में राहुल को ऍफ़ आई आर दर्ज करवाना जरुरी नहीं है। खुद क्षेत्राधिकारी और थानाप्रभारी ऍफ़ आई आर दर्ज करवा शकते है जिसकी मौजूदगी के अस्तित्वमे यह अपराध हुआ। पुलिस अधिकारी भी कानूनके अंतर्गत अपनी फ़र्ज़ को बाजु में रखकर तत्वज्ञान की बातें करते है यह कहते हुए के जातिव्यवस्था भारतकी नस-नस मे गहराई से फैली हुई है। राहुल को यह समज़मे आ गया है की उसके पक्ष मे उसकी जाहिर बेइज्जति की विडिओ देखनेवाले २००००० लाख लोग जरूर थे लेकिन सत्ता और क़ानूनी तंत्र उसके पक्ष मे नहीं है। उसके साथ जो हुआ उसके लिए सर्वोच्च न्यायलय के न्यायमूर्ति 'सुओमोटो' कार्रवाई नहीं शुरू करेंगे की 'संविधान-का-तिरस्कार' हुआ है।
मायावतीजी एक से ज्यादा बार इस राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी है। उन्होंने इस घटना में 'उच्च-स्तरीय' जाँच याची है। ३००० सालकी बात छोड़े, आजादीके ७३ सालमें दलित उप्तीड़न बढ़ रहा है। कितनी और कब तक जाँच करेंगे ? जाँच के बीस-पच्चीस साल बाद भी न्याय नहीं मिलता ऐसी सेंकडो घटना मौजूद है। जैसे देशके राष्ट्रपति दलित होने से कोई फरक नहीं पड़ता या दलित मुख्यमंत्री होने से फरक नहीं पड़ता ऐसे भारत की पार्लमेंन्टमें ९० से अधिक सांसद होने से भी फरक नहीं पड़ता।
भारतकी सही 'एकता' और 'अखंडितता' के दर्शन श्मशानभूमि में ही होता है। ‘हिंदुत्व’ कितना मजबूत है यह सत्य भी आर.एस.एस को श्मशानभूमि में ही पता चलेगा। यह सभी स्मशानभूमि की जमीनें जो अलग-अलग जातियां खुदकी बताते है जो दरअसल 'सरकारी' है। सरकारी संसाधन; तालाब-कुआँ-स्मशान-बागवान-स्नानघाट; पर सभी नागरिकोंका अधिकार है यह कानून आजादी के पहले बॉम्बे -लेजिस्लेटव काउंसिल मे पारित किया गया था और उसीके आधार पर डॉ. अम्बेडकरने 'महाड-सत्याग्रह' का आंदोलन किया था। आजादी के बाद प्रख्यात कर्मशील बाबा आढावने महाराष्ट्रमें 'एक गाँव -एक पनघट' आंदोलन चलाया था। छुआछूत के खिलाफ प्रचंड आंदोलन हमने आज़ादी के पहले १९२० और १९३० के दसक में जरूर देखे लेकिन जातिप्रथा के खिलाफ आज़ादी के बाद हमनें यह आंदोलन समाप्त कर दिया क्योकि हमनें संविधानमे 'छुआछूत' को अपराध घोषित कर दिया, 'अत्याचार निषेधक कानून बनाया और आरक्षण की निति बना ली।
थोड़े साल पहले मैंने उत्तर प्रदेश के जौनपुर के गावोंको दौरा किया था। ऐसे ही एक गाँव अकबरपुर। तब मुख्यमंत्री दलित थे। मेरे साथी दोस्त रामकुमार मेरे साथ थे जिन्होंने पिछले कई सालोसे रात-दिन दलित उप्तीड़न के सवालोमे भारी संघर्ष किया है। हमारी मुलाकात के करीब डेढ़ साल पहले इस गाँवमे घटना घटी थी। गाँवमे आठ मुशहर परिवार रहते है जो स्थानांतरित मजदुर थे। छह महीना परिश्रम करके अभी गाँव लोटे थे और जो पैसे कमाए थे वो भी साथ लेके आए थे। उसी रात बुकानी के पीछे अपने चेहरे छुपाकर बन्दूकधारीओने मुशहर बस्ती पर डाका डाला। दलित सहमे हुए थे और अपनी सभी सम्पती दबंगों के सामने रख दी इस बिनती के साथ के वो सलामत रहे। दबंगोने पैसे तो ले लिए लेकिन जाने से पहले पुरुषो और महिला को अलग कमरों में बंध कर दिया । जाने से पहले उन्होंने दो नौजवान औरतो पर सामूहिक बलात्कार किया। दो में से एक महिला जो इस घर मे शादी कर आयी थी उसने अभी पंद्रह दिन पहले ही बच्चे को जन्म दिया था। दूसरी महिला इस परिवार की बेटी थी और उसका पति मजदूरी के लिए दूसरे राज्य में गया था। में गया तब वो जवान लड़का अपनी पत्नी की इज्जत की रक्षा करने मे असहाय रहने के लिए आत्महत्या करने पर मन बनाये बैठा था और अपने आंसू रोक नहीं पा रहा था। पूछने से पता चला की न तो इस महिलाओ को बलात्कार बाद वैद्यकीय सुश्रुषा मिली थी न तो इस अपराध के बारे में ऍफ़.आई.आर दर्ज हुई थी। पुलिस कह रही थी की जाँच समाप्ति के बाद ही ऍफ़.आई. आर दर्ज हो सकती थी।
राहुल को बुरा नहीं मानना चाहिए। अख़बार बताते है की इस गाँवमे मुस्लिम की श्मशानभूमि नहीं है और वो अपने घरो में अपने मृतकों की अंतिमविधि पूर्ण करते है। आतंकियों की गोलीसे कश्मीर में 'शहीद' होने के बाद राष्ट्रध्वज में लपेटा हुआ दलित शब की अंतिमविधि भी उत्तर प्रदेश के गाँव वालोने रोकी थी यह घटना और ऐसी दूसरी घटनाए 'भेदभारत' में छपी हुई है।
राहुल को इस लिए भी बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि दलित भी इस बात से सहमत है की जाती और उप-जाती के अनुसार स्मशान भूमि अलग होनी ही चाहिए। गुजरात के गाँवमे यही हालत है। दलित श्मशानभूमि में वाल्मीकि मृतक की अंतिमविधि असंभव है। उप-जाती के बाहर जैसे शादी नहीं हो सकती है और अगर हुई तो हिंसा-मुक्त नहीं हो सकती है ऐसे उप-जाती के बाहर घर भी किराये पर नहीं दिए जाते है। भारतका राष्ट्रवाद डॉ आंबेडकर-रचित संविधान पर नहीं लेकिन जिस जाती-व्यवस्था का डॉ आंबेडकर निर्मूलन चाहते थे उसी जाती-व्यवस्था पर टिका है। और ऐसे देखा जाए तो 'दलित' पहचान एक भ्रम है क्योंकि जाती-उपजाती के साम्राज्य को चलते हुए 'दलित' की पहचान उभर ही नहीं सकती।
आशा रखते है, कई सालो के संघर्ष और हिंसक राजनीती के बाद अयोध्या में राममंदिर का निर्माण कार्य शुरू होने वाला है, उससे दलितों के 'हिन्दू' धर्म की रक्षा बढ़ेगी।
Martin Macwan
Dalit Shakti Kendra
30 July 2020
Very good👍👍👍
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